कोरोना टीकाकरण की प्राथमिकता में गंभीर मरीज कहां हैं?

प्रधानमंत्री ने CBSE की परीक्षा देने जा रहे छात्रों को सुझाव दिया है कि पहले कठिन प्रश्नों को हल करना चाहिए. कई लोग मज़ाक उड़ा रहे हैं कि पहले हल्के प्रश्नों को हल करना चाहिए. यह सुझाव अच्छा नहीं है. मेरी राय में प्रधानमंत्री की बात ठीक है. आखिर कठिन प्रश्नों से कब तक बचा जा सकता है. वैसे उन्हें भी पीएम बनने के बाद प्रेस कांफ्रेंस कर पत्रकारों के कठिन प्रश्नों का सामना करते रहना चाहिए था. उम्मीद है अक्षय कुमार को अब इंटरव्यू करने का मौका नहीं मिलेगा. उन्हें मिलेगा जो कठिन प्रश्न पूछते हैं. प्राइम टाइम के इस कठिन एपिसोड में हम कोरोना से संबंधित उन कठिन प्रश्नों की पहचान करेंगे जिनका उत्तर या तो पहले मिलना था या फिर इस एक साल में हल कर लिया जाना चाहिए था. भारत के स्वास्थ्य सचिव राजेश भूषण कहते हैं कि सबको टीका नहीं दे सकते हैं. जिन लोगों को ज़्यादा ख़तरा है उन्हें दिया जा रहा है. लेकिन क्या इसका कोई वैज्ञानिक आधार सरकार के पास है कि जिस मरीज़ को डायलिसिस के लिए जाना होता है उसके लिए कोरोना ख़तरा नहीं है? कैंसर के जो मरीज़ कीमो के लिए जाते हैं उन्हें टीके की ज़रूरत नहीं है? ऐसे लोगों को टीकाकरण की प्राथमिकता सूची से बाहर रखने का क्या वैज्ञानिक आधार रहा होगा? यह इस वक्त का सबसे बड़ा कठिन प्रश्न है. पहले हल नहीं किया गया तो क्या अब किया जाएगा?

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अगर पत्रकारों के पास कोरोना को लेकर बहुत सारे प्रश्न हो तो उन्हें लंबा इंतज़ार करना होता है क्योंकि स्वास्थ्य मंत्रालय सप्ताह में एक बार प्रेस कांफ्रेंस करता है. इस दौरान होता यह है कि रूटीन प्रश्न भी सूख कर कठिन प्रश्न हो जाते हैं. मुंबई की मेयर ने बीएमसी को पत्र लिखा है कि सभी उम्र के पत्रकारों को टीका लगे. उत्तराखंड सरकार ने भी यही फैसला किया है. जब पत्रकारों के लिए ऐसा फैसला हो सकता है उनके लिए उम्र की सीमा समाप्त हो सकती है तो डायलिसिस और कीमो पर जाने वाले मरीज़ों के लिए क्यों नहीं हटाई जा सकती है? यह भी एक कठिन प्रश्न है.

कोरोना को लेकर कठिन प्रश्नों की ऋंखला में एक कठिन प्रश्न यह भी है कि हमारा सिस्टम कब वैज्ञानिक आधार से चलने लगता है या कब राजनीतिक आधार से चलने लगता है किसी को पता नहीं चलता. चले तब भी और न चले तब भी हर बात में आधार कार्ड क्यों मांगता है, यह भी समझ नहीं आता. कठिन प्रश्न पहले हल करने की बात करने वाले प्रधानमंत्री से पूछा जा सकता है कि कोरोना को लेकर जो कठिन प्रश्न पिछले साल उपस्थित हुए थे उनका क्या हुआ, क्यों हम एक साल बाद भी अस्पतालों में बिस्तर बढ़ाने के नाम पर निजी अस्पतालों को रिज़र्व कर रहे हैं. सरकारी अस्पतालों में लाखों बेड बनाने के उस समय के दावों का क्या हुआ? 

बुधवार रात एक वीडियो है अहमदाबाद सिविल अस्पताल का. एक एंबुलेंस आ रही है एक जा रही है. अस्पताल के बाहर एंबुलेंस की भीड़ बता रही है कि कठिन प्रश्नों को जनता के ऊपर छोड़ दिया गया है और खुद नेता लोग चुनावी सभाओं में हल्की हल्की बातें कर रहे हैं. खबरें छप रही हैं कि सिविल अस्पताल में मरीज को भर्ती होने में समय लग रहा है. संक्रमण इतना फैल गया है कि ग्रामीण इलाके से भी कोविड के मरीज़ आने लगे हैं. एंबुलेंस में एक मरीज़ को लाने ले जाने में और फिर से सैनिटाइज़ करने में एक घंटा तो लग ही जाता होगा. अहमदाबाद में सात अप्रैल को 804 केस आए हैं. अहमदाबाद के अखबार लिख रहे हैं कि RT-PCR टेस्ट करने वाले पैथॉलोजी लैब के यहां इतने फोन आ रहे हैं कि वे घर-घर जाकर सैंपल जमा नहीं कर पा रहे हैं. उनके केंद्रों में भी लोगों के पहुंचने की संख्या इतनी है कि सभी का सैंपल लेने और टेस्ट करने में दिक्कत आ रही है. पैथ लैब का कहना है कि क्षमता से अधिक टेस्ट करने पर क्वालिटी खराब होगी. डॉक्टर भी कह रहे हैं कि RT-PCR टेस्ट करने का रिज़ल्ट आने में 48 घंटे से अधिक की देरी हो रही है. दवा न मिलने और टेस्ट रिज़ल्ट देरी से आने के कारण किसी की जान ख़तरे में पड़ सकती है.

हमारी सहयोगी वृंदा ने देशभर में 108 नंबर एंबुलेंस सेवा देने वाले समूह GVK EMRI के जसवंत प्रजापति से बात की. उन्होंने बताया कि अहमदाबाद शहर में हर दिन एबुंलेंस के अलग 750 कॉल आते हैं. इसमें कोविड के अलावा दूसरे केस भी हैं. जसवंत का कहना है कि कोविड के मरीज़ को लाने ले जाने में देरी होती है क्योंकि नियमों के मुताबिक एंबुलेंस को सैनिटाइज़ भी करना होता है. कोविड के कॉल बढ़ जाने से दूसरी आपात सेवाओं के लिए रखी गई एंबुलेंस को भी कोविड में लगा जाया जा रहा है.

अमहदाबाद मिरर ने लिखा है कि पूरे मार्च में चार बड़े शहरों में कोरोना के 4955 मरीज़ भर्ती हुए थे लेकिन अप्रैल के पहले छह दिनों में 4,442 मरीज़ भर्ती हुए हैं. अस्पतालों की सुविधाओं पर इस स्तर का दबाव पड़ रहा है. कम समय में महीने भर के बराबर मरीज़ पहुंच रहे हैं. जसवंत प्रजापति ने बताया कि 23 मार्च को कोविड के 85 मरीज़ों को एंबुलेंस सेवा की ज़रूरत पड़ी थी लेकिन अगले ही दिन यानी 24 मार्च को 110 मरीज़ों को आपात सेवा में ले जाया गया. 31 मार्च को मरीज़ों की संख्या 200 हो गई और 7 अप्रेल को ये संख्या 482 हो गई. आप समझ सकते हैं कि कोरोना के कारण किस तरह की चुनौतियां आ चुकी हैं और आने वाली हैं. 

गुजरात के उप मुख्यमंत्री नितिन पटेल ने सिविल अस्पताल का दौरा भी किया है. अन्य ज़िलों के हालात की भी समीक्षा की है. प्रधानमंत्री और गृह मंत्री बता सकते हैं कि एक साल बाद भी अहमदाबाद में अस्पतालों की हालत ऐसी क्यों हैं? वहां भी रेमडेसिवियर की कमी हो गई है. अहमदाबाद ही नहीं सूरत में भी लोग लाइनों में लगे हैं.

सूरत के नवी सिविल अस्पताल में रेमडेसिवियर लेने की लाइन देख कर आप आम जनता की कठिनाई का अंदा़ज़ा किया जा सकता है. प्रधानमंत्री इस कठिन प्रश्न का उत्तर दें कि जब पता था कि कोरोना जाने वाला नहीं है, आता ही रहेगा तो फिर रेमडेसिवियर की कमी क्यों हो गई? बुधवार को पीटीआई से खबर जारी होती है कि मुख्यमंत्री रुपाणी ने राज्य की एक कम्पनी को 3 लाख रेमडेसिवीर के इंजेक्शन का ऑर्डर दिया है. कम्पनी अब हर रोज़ 20 हज़ार इंजेक्शन सप्लाई कर रही है. अभी बीस हज़ार मरीज़ तो नहीं आए हैं तो फिर अहमदाबाद और सूरत में कतारें क्यों लग रही हैं? क्यों दो दो दिन लग रहे हैं इस दवा को हासिल करने में. इस प्रश्न का उत्तर इतना कठिन क्यों है?

आम आदमी कठिन प्रश्नों के साथ कठिन जीवन जी रहा है. उसकी कठिनाई हेडलाइन नहीं है. अगर इस दवा की कमी के कारण किसी की मौत हो गई तो कौन ज़िम्मेदारी लेगा. अहमदाबाद के एक अस्पताल की डॉक्टर ने सोशल मीडिया पर अपना वीडियो डाला है और अपील की है कि जल्दी ही ऑक्सीजन सिलेंडर उपलब्ध कराया जाए, मरीज़ों को दिक्कत आ रही है.

नाशिक की हालत ऐसी है कि लोग रेमडेसिवियर लेने के लिए दूर दूर से आए हैं. नाशिक के आस पास के इलाको में मरीज़ भर्ती हैं. डाक्टर ने कहा होगा कि दवा लेकर आएं तो भागे भागे आए हैं. यहां बोर्ड लग गया है कि दो तीन दिनों तक दवा ही नहीं मिलेगी. प्रशासन ने आदेश निकाला है कि केवल उन्हीं लोगों को रेमडेसिवियर की दवा दी जा सकती है जिनके मरीज़ अस्पताल में भर्ती हैं.

अब जाकर महाराष्ट्र में फिर से रेमडेसिवियर का उत्पादन शुरू हुआ है लेकिन इसके सप्लाई होने में 15-20 अप्रैल तक का समय लगेगा. अगर इस दवा के न मिलने से किसी की जान गई तो कौन ज़िम्मेदार होगा. आपने बुधवार के प्राइम टाइम में भी देखा था कि इंदौर और भोपाल में इस दवा को लेकर कितनी बुरी हालत है. 

महाराष्ट्र में भी रेमसेडिवियर की कमी हो गई है. फूड एंड ड्रग्स अथॉरिटी के कमिश्नर का कहना है कि छह कंपनियां ही रेमडेसिवियर का उत्पादन करती हैं. दिसंबर 2020 के बाद से उत्पादन बंद कर दिया. किस वैज्ञानिक आधार पर? क्या किसी ने दावा किया था कि कोरोना खत्म हो गया, रेमडेसिवियर की ज़रूरत नहीं होगी. क्या किसी को फर्क नहीं पड़ा, किसी ने अलार्म बेल नहीं बजाया कि ऐसा नहीं होना चाहिए?

नाशिक में हालत खराब है. अस्पतालों पर दबाव इतना बढ़ने लगा है कि महानगरपालिका के एक कोविड अस्पताल ने टीका का काम बंद कर दिया. यहां 700 मरीज़ भर्ती होने थे लेकिन भर्ती किए गए हैं 710. आप सोच सकते हैं कि क्या हालत है. अगर ज्यादा टेंशन हो तो यू टयूब पर गृह मंत्री का चुनावी रोड शो का वीडियो देखने लग जाइये. कोरोना का टेंशन दूर हो जाएगा.

कोरोना से होने वाली मौत के बाद दफनाने या अंतिम संस्कार की एक प्रक्रिया होती है जिसमें वक्त लगता है. इस कारण श्मशान घाट पर कतार लंबी होती जा रही है. लखनऊ में कोविड से मरने वाले इतने हो गए हैं कि श्मशान में टोकन लग रहा है. एक बॉडी आने के 8 घंटे बाद उनका अंतिम संस्कार हो पा रहा है.

आसमानी बातों से ज़मीन के हालात नहीं बदलते हैं. अगर अस्पतालों के बाहर से हर जगह से रिपोर्टिंग हो रही होती तो आपको पता चलता कि कोरोना के मरीज़ों की संख्या का बढ़ना सिर्फ एक डेटा नहीं है. मुसीबत का फेंटा है जो एक बार गले में बंध गया तो आसानी से खुलता नहीं है. चौबीस घंटे में 1 लाख 26 हज़ार से ज्यादा नए केस आए हैं. मज़ाक नहीं है.

प्रधानमंत्री बता सकते हैं कि गृहमंत्री अमित शाह के लिए मास्क पहनना इतना कठिन क्यों है? अगर नहीं पहन रहे हैं तो चुनाव आयोग के लिए कार्रवाई करना इतना कठिन क्यों है? मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ सेल्फ आइसोलेट की बजाए रैली क्यों कर रहे हैं? क्या कोरोना के कठिन प्रश्न का यही उत्तर है कि रैली की जाए. रोड शो किया जाए. विषयांतर हो जाएगा लेकिन एक ही गाने की याद आती है जिसमें कठिन शब्द का इस्तमाल हुआ है. ”वक्त दो ही ज़िंदगी में गुज़रे हैं कठिन, एक तेरे आने के पहले, एक तेरे जाने के बाद. ला पिला दे साकिया.” इस महामारी को लेकर हर कोई अपने अपने नशे में नज़र आ रहा है. जिन पर कोविड के उचित व्यवहार को पेश करने की ज़िम्मेदारी है वही अनुचित व्यवहार कर रहे हैं. anyway. Leave it here. Let’s move there. 

टीका को लेकर पत्रकार कठिन प्रश्न पूछ रहे हैं मगर कोई उत्तर देने की कठिनाई मोल नहीं लेना चाहता. कठिन प्रश्न यह है कि सरकार बताए कि किस राज्य को टीके का कितना डोज़ दिया गया है ताकि पता चले कि महाराष्ट्र को कितना दिया गया और गुजरात को कितना दिया गया. मुंबई में टीका केंद्र बंद होने शुरू हो गए हैं. हमारे सहयोगी ने बताया है कि 73 प्राइवेट केंद्र थे जिनमें से आज 26 बंद हो गए और कल 24 बंद हो जाएंगे क्योंकि टीका नहीं है. कुछ सरकारी टीका केंद्र के आज बंद होने की संभावना है. महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री कह रहे हैं कि टीका न होने के कारण सतारा, सांगली, पनवेल में टीकाकरण बंद कर दिया गया है. बुलढ़ाणा में आज भर का ही स्टाक है.

महाराष्ट्र के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने कहा, ‘मेरे पास केन्द्र सरकार का जो रिलीज ऑर्डर है उसके अनुसार केंद्र द्वारा हमे सिर्फ 7.5 लाख वैक्सीन दिया गया जबकि यूपी और एमपी में 40 लाख वैक्सीन दिया गया है. हर्षवर्धन जी से मैने बात की, शरद पवार जी ने भी बात की, फिर भी वैक्सीन अभी तक उपलब्ध नहीं हो पा रहा है. वैक्सीन के अभाव में सतारा, सांगली और पनवेल में वैक्सीनेशन बंद कर दिया गया, बुलढाणा में सिर्फ आज भर का स्टॉक है.’

महाराष्ट्र की इस बात को लेकर केंद्र नाराज़ है. केंद्र का कहना है कि महाराष्ट्र के पास स्टाक है लेकिन स्टाक की कमी तो आंध्र प्रदेश और तेलंगाना सहित अन्य राज्यों ने भी जाहिर की है. आंध्र प्रदेश में तीन लाख डोज़ ही बचे हैं. पूरे राज्य में दो दिन का ही स्टाक है. उन्हें लेकर केंद्र आक्रामक नहीं है. और केंद्र सभी राज्यों के स्टाक को पब्लिक क्यों नहीं करता है ताकि जानने में किसी को कठिनाई न हो और ऐसे मामूली सवाल कठिन प्रश्न में न तब्दील हों.

दिल्ली के स्वास्थ्य मंत्री ने कहा है कि केंद्र के अस्पतालों में 30-40 प्रतिशत टीके लग रहे हैं जिसके कारण दिल्ली का औसत कम हुआ है. दिल्ली में अभी चार से पाच दिनों का स्टाक है.

टीका को लेकर कठिनाई तो आ रही है. हमारे सहयोगी रवीश रंजन शुक्ल ने बताया है कि गाज़ियाबाद के सरकारी अस्पतालों में टीका तो लग रहा है लेकिन कई प्राइवेट अस्पतालों में 4-5 दिनों से टीके की सप्लाई बंद है. ज़िलाधिकारी का कहना है कि प्राइवेट अस्पतालों ने पंजीकरण के नियमों का सही से पालन नहीं किया है, हो सकता है इस कारण से टीका की आपूर्ति बंद हो गई हो. क्या इस आधार पर भी टीके की कमी हो रही है?

सरकार को एक कानून लाना चाहिए. इस कानून के तहत सभी हास्यास्पद फैसलों को गंभीर घोषित कर दिया जाए ताकि कोई हंसे न. कोरोना को लेकर तरह तरह की तालाबंदी होने लगी है. पिछले साल की तालाबंदी से क्या हासिल हुआ, क्यों लगी थी, कोई नहीं जानता है, लेकिन बर्बादी हुई, नौकरियां गईं ये सब जानते हैं. अब फिर से तालाबंदी हो रही है. पन्ना भर भर कर निर्देश जारी हो रहे हैं. भारत में इतने प्रकार के कर्फ्यू आ गए हैं कि उन पर शोध करने के लिए अलग से कर्फ्यू यूनिवर्सिटी की ज़रूरत होगी.

गाज़ियाबाद और गौतमबुद्ध नगर में रात दस बजे से सुबह पांच बजे तक कर्फ्यू होगा. लखनऊ, कानपुर, प्रयागराज, वाराणसी में रात 9 बजे से सुबह छह बजे तक कर्फ्यू है. मध्यप्रदेश के सभी शहरी इलाकों मे शाम छह बजे से कर्फ्यू लगाया जाएगा.

9 बजे से कर्फ्यू लगाने पर कोरोना कितना कम होता है और दस बजे से कर्फ्यू लगाने पर कितना कम होता है इस पर शोध करने के लिए कर्फ्यू वैज्ञानिक की आवश्यकता होगी. ताकि पता तो चले कि तमिलनाडु के अफसरों ने क्या सोच कर रात आठ बजे के बाद धार्मिक स्थानों को बंद किया है. क्या अफसरों की मीटिंग में जो बिस्कुट खाया जाता है उसका असर है या इसके पीछे कोई वैज्ञानिक भावना है. इन फैसलों से लाखों करोड़ों लोगों की ज़िंदगी प्रभावित होती है. तालाबंदी ने पहले ही करोड़ों लोगों को गरीबी में धकेल दिया है.

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